
हर रचना के पीछे कुछ न कुछ होता है.. कोई घटना, याद, लगाव, दर्द... कोई उपलब्धि या कुछ ओर...यदि किसी रचना को उस परिवेश से जोड कर पढा जाये जिस के अन्तर्गत वह लिखी गई है तो शायद पाठक आन्तरिक रूप से उस रचना के अधिक समीप पहुंच पाता है.
यह रचना उस व्यक्ति की मनोस्थिति को दर्शाती है जो अपनी मां और पिता जी के देहान्त के दो वर्ष बाद अपने गांव उस घर में लौटा है जहां वो अपने परिवार के साथ अक्सर आता जाता था जब मां और पिता जी जीवित थे. बंद पडे घर की दशा देख कर उसके मन में उठते भावों को शब्दों में बांधने का प्रयास है.. कहां तक सफ़ल हुआ हूं यह पाठक तय करेंगे.
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रचनाकार परिचय:-
मोहिन्दर कुमार का जन्म 14 मार्च, 1956 को पालमपुर, हिमाचल प्रदेश में हुआ। आप राजस्थान यूनिवर्सिटी से पब्लिक एडमिन्सट्रेशन में स्नातकोत्तर हैं।
आपकी रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं साथ ही साथ आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं। आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में एक हैं।
वर्तमान में इन्डियन आयल कार्पोरेशन लिमिटेड में आप उपप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।
जहां से
झांका करता था
बचपन मेरा
वो अटारी
बंद पडी है
छत और आंगन
अटे हुये हैं
काई और सूखे पत्तों से
हर दम
खिलने वाली क्यारी
बदरंग पडी है
मां जी के हाथों नित
पुतने वाला चुल्हा
फ़टा-फ़टा
बदहाल पडा है
ताक पर धरी हांडियां
प्रतीक्षारत
आंच आलन औटन के
खाली घडा औंधे मुंह
एक तरफ़ पडा है
आटे दालो के डिब्बों में
घुन-पंखूं की
भरमार हो गई
पूरे घर में
चूहे मकडों की
सरकार हो गई
जहां जमाते बाबू जी
पूजा पाठ का आसन
वो तख्त
दिवार के साथ
खडा हुआ है
नहीं कोई स्वर गुंजता
मौन का आवरण
चढा हुआ है
कील पर टंगी
बाबूजी की टोपी में
छेद कर दिये कीटों ने
और बैठक की खिडकियां
सनी पडी पक्षी बीठों से
चार दिवारी की बाड से
लोग ले गये
ख्पची और खूंटे
कितना कुछ यहां
बदल गया है
देख कर दिल
दहल गया है
मन के तार हैं टूटे
छोटा सा घर
थोडा सा सामान
मगर संसार लगे
जिधर घुमाऊं
नजर मैं अपनी
यादों के अंबार लगे
यहां कोई नहीं अब
बाट जोहता
मन का मर्म
कौन टोहता
सब कहते
ईंटों का घर है
कैसे समझाऊं
जो मेरे भीतर है


16 टिप्पणियाँ
भावुक कर दिया आपने तो..बहुत उम्दा रचना. बधाई.
जवाब देंहटाएंअच्छी कविता लिखी!
जवाब देंहटाएं--
सरकारी नौकरियाँ
गुलाबी कोंपलें
यहां कोई नहीं अब
जवाब देंहटाएंबाट जोहता
मन का मर्म
कौन टोहता
सब कहतेईंटों का घर है
कैसे समझाऊं
जो मेरे भीतर है
भावनापूर्ण कविता।
निश्चित ही कविता बेहद भाविक करने वाली है। छोटे छोटे दृश्य कविता को कसावट दे रहे हैं। आपने दृश्य खींच कर पाठक को चित्रलिखित कर दिया है, कविता में उतर कर नम आँखों से ही बाहर आया जा सकता है।
जवाब देंहटाएंयहां कोई नहीं अब
बाट जोहता
मन का मर्म
कौन टोहता
सब कहतेईंटों का घर है
कैसे समझाऊं
***राजीव रंजन प्रसाद
जो मेरे भीतर है
मार्मिक कविता है।
जवाब देंहटाएंमाता-पिता की रिक्ति कभी भरी नहीं जा सकती। आपने मन हूक को भाविक शब्द दे कर प्रस्तुत किया है।
जवाब देंहटाएंछोटा सा घर
थोडा सा सामान
मगर संसार लगे
Nice Poem. Thanks.
जवाब देंहटाएंAlok Kataria
EK ACHCHHEE KAVITA KAHEE HAI AAPNE.
जवाब देंहटाएंMAHINDER KUMAR JEE MEREE BADHAAE
SWEEKAR KIJIYE.
मर्मस्पर्शी कविता है, अच्छी कविता के लिये मेरी बधाई स्वीकार करें।
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी रचना, बिसरी यादें जीवन को बहुत कुछ देती है. उत्तम रचना के लिये आपको बधाई.
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी कविता है।
जवाब देंहटाएंचार दिवारी की बाड से
जवाब देंहटाएंलोग ले गये
ख्पची और खूंटे
कितना कुछ यहां
बदल गया है
देख कर दिल
दहल गया है
मन के तार हैं टूटे
मन को छूने वाली कविता है।
प्रभावी।
जवाब देंहटाएंछोटा सा घर
जवाब देंहटाएंथोडा सा सामान
मगर संसार लगे
जिधर घुमाऊं
नजर मैं अपनी
यादों के अंबार लगे
यहां कोई नहीं अब
बाट जोहता
मन का मर्म
कौन टोहता
सब कहते
ईंटों का घर है
कैसे समझाऊं
जो मेरे भीतर है
चित्र-लिखित, मर्मस्पर्शी कविता.....
कैसे समझाऊं
जो मेरे भीतर है
बधाई स्वीकार करें।
यहां कोई नहीं अब
जवाब देंहटाएंबाट जोहता
मन का मर्म
कौन टोहता
सब कहते
ईंटों का घर है
कैसे समझाऊं
जो मेरे भीतर है
दिल की जिस अनुभूति को आपने अभिव्यक्ति प्रदान कर दी वह वर्णातीत है। एक-एक पंक्ति दिल को छूती हुई लगी। बधाई स्वीकारें।
aapki kavita ne aansun bhar diye
जवाब देंहटाएंshabad nahi hai is rachna ki tarif ke liye
आपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.