यादों का मानव-जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। वास्तविक घटना के वर्षों बाद भी उसकी याद अपना असर दिखाती रहती है। जीवन-पथ में मानव बार-बार यादों की इस एकांत कोठरी में लौटता रहता है; फिर चाहे ये यादें सुखद हों या पीड़ादायक। और अगर ये याद किसी ऐसे व्यक्ति से जुड़ी हो जिसे कभी मन ने अपना सर्वस्व माना हो तब तो बात ही क्या है!

ऐसी ही एक अनुभूति को शब्द देता है, स्वरशिल्पी द्वारा प्रस्तुत कवि महेंद्र भटनागर का ये गीत; जिसे आवाज़ दी है, उन्हीं के सुपुत्र आदित्य विक्रम ने। तो आइये सुनते हैं सुधियों के सागर में डूबता-उतराता ये गीत: