दरख़्त था सदियों पुराना, और छांह भी।
दरख़्त था घना, छांह उससे भी घनी।
दरख़्त था हवादार, छांह कहीं अधिक शीतल ।
दरख़्त सब का, छांह भी सबकी अपनी।

--

एक शाम
राम चलते चलते थक गया। घनी छाया मे पेड़ से सटकर सुखासन मे बैठ गया।
किसी पल थका थकाया मुहम्मद भी आया,उसी दरख़्त के नीचे ठंडी ठंडी छांह मे सिरहाना लगा लिया।
याद नहीं पड़ता ठीक से कि राम ने सुखासन पहले लगाया कि मुहम्मद ने सिरहाना?
ठीक है , क्या फ़र्क़ पड़ता है छांह को ?

--

दूसरी सुबह
दिन निकला तो रौला मच गया।
धर्मसेवकों , समाजसेवकों और पंथ सेवकों का जमघट लग गया।
राम के सुखासन पर मुहम्मद का क़ब्ज़ा--!
मुहम्मद के सिरहाने पर राम का अतिक्रमण --!
छांह को क्या?

--

दमदार बाहुबलियों की बिसात।
अपने अपने तर्क ... अपनी अपनी दलीलें।
दरख़्त की हवा बांट दो... बंटी नहीं।
ठंडक बांट दो ...  बंटी नहीं।
छांह बांट दो बंटी नहीं।
बंदर-बांट करते करते ख़्याल कोंधा...
दरख़्त काट दो...  कट गया।
हवा खो गयी, ठंडक खो गयी, छांह खो गयी।

मुझे क्या... ??

*****