कोसी मंद पड़ रही
लौट रहे लोग
सब कुछ हारकर वापस
अपने घर मकान खेत-खलिहान।
सबकी आँखें ढूँढ़ रही अपने-अपनों को।

लोगों की बाढ़ अब उमर रही
दियारा में गाँव में शिविरों में
सिर पर मोटरी उनके
गोद में, कंधे पर बाल-गोपाल
चेहरे पर गहरी चिंता लिये
मन-मन भर भारी पैर से
चलते हैं धीरे-धीरे
नई मिट्टी और रेत पटे रस्ते पर
पगडंडियों पर
दूर बहुत दूर तलक पसरे
मृणमय श्मशानी चुप्पियों
और मातम के बीच।

विलाप और थकान सर्वत्र
महामारी और सड़ा पानी सर्वत्र।

हर आँख में लहराता
आँसूओं का पारावार।

धराशायी झोंपड़ी और मकान
गिरे हुए पेड़
पानी में तैरती लाशें
उन पर चीलों-कौवों छीना-झपटी
से जब-तब टूटता हुआ सन्नाटा
मरे जानवरों से उठती दुर्गंध
राहत-शिविरों में अन्न की
उम्मीद में घंटों खड़े लोग
ध्वस्त मकानों की ओट में
प्रसव-पीड़ा से कराहती औरतें
बरबादी के खौफ़नाक़ मंजर,
और और!

पानी घट रहा
कि पानी बढ़ रहा!
कोसी मंद पड़ रही
कि कोसी समा रही!
जन-जन की आँख में
नीर बनकर,
हृदय में लोगों के
दुस्सह पीड़ बनकर!!