इस दुनिया में
कई-कई दुनियाएँ गुप्त हैं जैसे,
सपनों की दुनिया यादों की दुनिया
या फिर मन में बैठी डर की दुनिया
रचनाकार परिचय:-
सुशील कुमार का जन्म 13 सितम्बर, 1964, को पटना सिटी में हुआ, किंतु पिछले तेईस वर्षों से आपका दुमका (झारखण्ड) में निवास है।

आपनें बी०ए०, बी०एड० (पटना विश्वविद्यालय) से करने के पश्चात पहले प्राइवेट ट्यूशन, फिर बैंक की नौकरी की| 1996 में आप लोकसेवा आयोग की परीक्षा उत्तीर्ण कर राज्य शिक्षा सेवा में आ गये तथा वर्तमान में संप्रति +२ जिला स्कूल चाईबासा में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं।

आपकी अनेक कविताएँ-आलेख इत्यादि कई प्रमुख पत्रिकाओं, स्तरीय वेब पत्रिकाओं में प्रकाशित हैं।

जैसी भी दुनिया,
गहराई तक धँसती है आदमी में
और उसका अपना अलग चेहरा गढ़ती है

वह चेहरा आदमी को पहनता है हौले-हौले
और गायब होने लगता है
आदमी का अपना बेलौस असली चेहरा !

यह सब पर यकायक नहीं होता
लेकिन जब होता है तो
लुंड-मुंड इस चेहरे पर
वक़्त की राख जमने लगती है
पेशानी पर चिंता की
आरी-तिरछी लकीरें खिंचने लगती हैं

गोया कि अपनी दुनिया से निकलकर आदमी
एक अप्रत्याशित दुनिया में दाखिल हो जाता है
जहाँ दिन-रात दोजख़ की आग जलती है
जिसमें रोज़ उसका नया चेहरा चटकता है।

फिलहाल मसला यह नहीं कि
इस दुनिया में ऐसी कितनी दुनियाएँ हैं
आगोश में चेहरों की रौनकें बिगड़ रही है
बल्कि ज़रूरी है फिलवक़्त
उन चेहरों की शिनाख़्त
जो दुनिया को एक स्याह डर में
बदल देने पर आमादा हैं

बेरंग होते इस चमन में ढूँढ़नी है हमें
सियासत के वे झमाठ दरख़्त
जिनकी शाखाओं पर
अपराध की अमरलतायें फैलती हैं


जिनकी शिराएँ आदमी के मगज़ में घुसकर
डर और चुप्पियों का एक गुबार बनाती है
जो आदमी के खुशफ़हम इरादों की दुनिया को
अपनी धूल से ढक लेता है।