यदा - कदा विचित्र हो जाता है,
भीतर का असुर जग जाता है,
कामना से पोषित, लोभ में प्रेरित,
सतत बलिष्ठ होते जाता है।

होता आरम्भ तब,
चरित्र - हीनता का तांडव,
जीतते क्रोध के कौरव,
हारते संस्कार के पांडव।

मन पर अनियंत्रण,
कामेच्छा का प्रवाह,
विवेक का पतन,
वही, दुर्विचार - दुर्भाव |

राग - द्वेष का प्रहार,
चरित्र का क्षणिक हार,
कामनायों के मेघ सघन,
होते मर्यादाओं के उल्लंघन।

जब मद में वह हुंकारता,
अहम अहम अहम,
भीतर योगी - मुनि विलापता,
शिवोहम शिवोहम शिवोहम।