वृक्ष था जब मैं
जड था
गति लुभाती मुझको
सोचा करता
काश होता मैं भी
चलायमान
क्या है नदी के
इस धारे से
उस धारे तक
मैं भी जाता जान.

रचनाकार परिचय:-


मोहिन्दर कुमार का जन्म 14 मार्च, 1956 को पालमपुर, हिमाचल प्रदेश में हुआ। आप राजस्थान यूनिवर्सिटी से पब्लिक- एडमिन्सट्रेशन में स्नातकोत्तर हैं।

आपकी रचनायें विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं साथ ही साथ आप अंतर्जाल पर भी सक्रिय हैं। आप साहित्य शिल्पी के संचालक सदस्यों में एक हैं। वर्तमान में इन्डियन आयल कार्पोरेशन लिमिटेड में आप उपप्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं।


सुना है लोगों को कहते
तीव्र मनोइच्छा कोई भी हो
कालान्तर में
देवयोग से
पूर्ण हो जाती है

कौन जाने यह क्या था
मेरी इच्छा की पूर्ति
मेरे जडपन का अंत
अथवा
आकारण इच्छा का दण्ड

चली आरी कुल्हाडी मुझ पर
जड से जडपन से
टूटा नाता
खण्ड खण्ड हुआ
बचा जो कुछ वह थी
छीलन और टूटन

तना रहता जो तना था
आरे पर जा कर
तख्तों में हुआ विभाजित
इक कौने में पडा हुआ मैं
था मन से पीडित और पराजित

फ़िर इक दिन
समय ने करवट बदली
आरे से
मिस्त्री के अड्डे तक आया
सधे हाथों ने
काट पीट कर
छील छाल कर
जोड तोड कर
एक्दम बदल दी मेरी काया

हुई रंग रोगन से लीपा पोती
और मेरा श्रृंगार हुआ
अब बेनाम नहीं
इक नाम मिला
"धीमन की नौका"
आकार बदल कर मुझे मिला
वरदान गति का
और इच्छित
नदिया तक जाने का मौका