आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा..

लाख मजबूरियाँ, मेरे मौला
जिसके रस्ते डिगा नहीं पाती
पाँव पैबंद लगा कर न थका
जिसकी छाती में ज़िन्दगी गाती
उसने कल रात मुझसे ये पूछा
चाँदनी कब तलक जलायेगी
आसमानों में ही हरा क्यों है
है धरा जो, वो अधमरा क्यों है

मैं हँसा, प्रश्न बो लिये तुमने
उत्तरों का तो झुनझुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा॥


रचनाकार परिचय:-


राजीव रंजन प्रसाद का जन्म बिहार के सुल्तानगंज में २७.०५.१९७२ में हुआ, किन्तु उनका बचपन व उनकी प्रारंभिक शिक्षा छत्तिसगढ राज्य के जिला बस्तर (बचेली-दंतेवाडा) में हुई। आप सूदूर संवेदन तकनीक में बरकतुल्ला विश्वविद्यालय भोपाल से एम. टेक हैं। विद्यालय के दिनों में ही आपनें एक पत्रिका "प्रतिध्वनि" का संपादन भी किया। ईप्टा से जुड कर उनकी नाटक के क्षेत्र में रुचि बढी और नाटक लेखन व निर्देशन उनके स्नातक काल से ही अभिरुचि व जीवन का हिस्सा बने। आकाशवाणी जगदलपुर से नियमित उनकी कवितायें प्रसारित होती रही थी तथा वे समय-समय पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हुईं। वर्तमान में आप सरकारी उपक्रम "राष्ट्रीय जलविद्युत निगम" में सहायक प्रबंधक (पर्यावरण) के पद पर कार्यरत हैं। आप "साहित्य शिल्पी" के संचालक सदस्यों में हैं।

आपकी पुस्तक "टुकडे अस्तित्व के" प्रकाशनाधीन है।

तुम हो जैसे कोई हसीं साकी
जाम पर जाम छलकती जाये
भोर परछाईयों में अक्स दिखे
खुद को नारी कहे, हया आये
तुमने परबत बना दिये बेशक
तुमने बाँधा जरूर नदियों को
तुमको हासिल रहा लहू केवल
फिर जिसे बेच दिया बनियों को

हाल अपना ये बाकमाल किया
जैसे मुर्गा कोई भुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा॥

मुझको मालूम है तेरी बेटी
नुच गयी, बिक गयी बजारों में
और बेगार कर रहा बेटा
तेरी बीवी कहीं सितारों में
जिनकी खातिर तू जलता जाता है
उनको तुझसे भला मिला क्या है?
तू पसीनों को कीमती कह ले
उससे पतलून भी सिला क्या है?

तू पतंगा है, फँस गया जीवन
जाल मकडी नें यूँ बुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा ।।


तेरे जैसे कई हज़ारों हैं
जुड सको तो चलो, लडें मिलकर
आजमा लें कातिलों की बाजुएं भी
हाँथ थामे खंजरों में गडें मिल कर
कह तो दें हम हाकिमों से अब नहीं
बाप की जागीर सूरज है तुम्हारा
दूध तो बच्चों का हक होगा हमारे
नाग की अब पंचमी से है किनारा

आग का घी से सामना होगा
जलजला जल के गुनगुना होगा।
आईना तोडने से क्या होगा,
तेरा चेहरा ही सौ गुना होगा॥