कवि परिचय:-

अजय यादव अंतर्जाल पर सक्रिय हैं।
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सड़कें
वीरान हो आईं हैं
सर्दियों की इस रात में ।
जैसे सब का रुख
मुड़ गया हो सच की ओर ।

अपनी अपनी जगह
भीगती रोशनी में लिपटे
गुमसुम लैम्प-पोस्ट
सब कुछ शांत
सिवाय टपकती ओस के ।

सहसा दूर कहीं कोई आहट
ध्यान बरबस खिंचता है उस ओर
एक तसल्ली:
कोई तो है इसी राह पर ।

दिन में छोटा सा लगता रास्ता
बहुत लम्बा हो चला है
-ब्रह्मांड फैलता जा रहा है
और कदम खुद-ब-खुद
तेज उठने लगते हैं ।
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