सागर कितना गहरा होता है? अथाह शब्द का अर्थ हमें तब ज्ञात हुआ जब एक पूरा दिन कथाकार तेजेन्द्र शर्मा के साथ गुजारने के बाद भी, दिन बौना हो गया। तेजेन्द्र शर्मा की कहनियों, उनके कथानकों, घटनाओं और पात्रों से तो अनेको मुलाकातें हुई हैं लेकिन जब स्वयं तेजेन्द्र जी नें साहित्य शिल्पी को एक पूरा दिन देने की स्वीकृति प्रदान की तो यह एक कहानीकार की थाह पाने के स्वर्णिम अवसर जैसा था। ब्रिटेन में रह रहे तेजेन्द्र शर्मा से फिर आमने सामने की मुलाकात जाने कब होती, इस लिये उनके साथ का एक एक पल हमारे लिये महत्व का था, यह अलग बात है कि सुबह के नौ बजे से रात के दस बजे तक साथ गुजारने के बाद भी यह लगा कि प्यासे रहे। तेजेन्द्र असाधारण हैं।
सुबह लगभग नौ बजे ही साहित्य शिल्पी के मोहिन्दर कुमार, अजय यादव एवं राजीव रंजन प्रसाद, तेजेन्द्र जी से पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के अनुसार उनके फरीदाबाद स्थित निवास पर पहुँचे। टैक्सी में बैठ हम निकल चले, हमें एसे स्थलों की आवश्यकता थी जहाँ खुला वातावरण भी हो, भीड भाड भी न हो, जिससे कहानीकार की अपनी कहानी से अवगत होने की प्रक्रिया में कोई व्यवधान न हो सके। सूरजकुण्ड से बेहतर स्थल क्या हो सकता था, जो हमारा पहला पडाव था। महाभारत की कहानी का इन्द्रप्रस्थ, कहानीकार तेजेन्द्र का मुक्त हृदय से स्वागत करने को उद्यत था। गुनगुनी धूप में हजारों सीढियों के बीच सूखा हुआ तालाब अपनी उपस्थिति उन जख्मों को दिखा कर दे रहा था जो उसके वदन पर हजारों दरारों सी उभर आयी थीं। पत्थरों और झाडियों में दुबके प्रेमी जोडों की खामोशी और खड खड कर उडते सूखे पत्तों से टूटती चुप्पी के बीच साहित्य शिल्पी के वीडियो कैमरे और रिकॉर्डर तेजेन्द्र जी से मुखातिब हो गये। कहानीकार को स्वयं को अभिव्यक्त करने का जैसे माहौल मिल गया था। तेजेन्द्र अपने विषय में बताने लगे। अपने पिता उनकी विचारधारा...कैसे स्वतंत्रता आन्दोलन में उनके पिता को गोली लगी। परिवार उसके संघर्ष और उन संघर्षों से प्राप्त अनुभवों से धीरे धीरे कैसे उनके भीतर कहानीकार पनपा यह हमने विस्तार से जाना। यहीं हमे प्रवासी लेखक और प्रवासी लेखन जैसे शब्दों से उनकी खीज का पता चला। उनका मानना था कि दुनिया की कोई भाषा अपने लेखकों को इस तरह वर्गीकृत नहीं करती, लेखन लेखन है और उसे प्रवासी लेखन, दलित लेखन आदि लेबल प्रदान नहीं किये जाने चाहिये। उन्होंने शांति धारावाहिक के लिये अपने लेखन से जुडे अनुभव तथा फिल्म में अपने अभिनय के विषय में भी बताया। चर्चा लम्बी होती गयी और तेजेन्द्र जी से बातों नें हमें एक सम्मोहन में जकड रखा था। इसे तोडने की धृष्टता की बंदरों के एक झुंड नें, जिसने अचानक हमारे लैपटॉप और डिजिटल कैमरों पर हमला कर दिया।
हम फिर गाडी में सवार हुए और चल पडे अगडे पडाव की ओर। यह बातचीत के लिये वातावरण बदलने और कथाकार को मूड में लाने में भी सहायक हुआ। द्वारका की ओर बढते हुए हम रोज़ गार्डन पर रुके। पत्थरों से निकल कर फूलों के बीच आये। प्रेमी जोडों का यहाँ भी हर कोनों-कुंजों में कबजा था। मशक्कत के बाद हमें भी जगह मिल ही गयी। जहाँ चाह वहीं राह। तेजेन्द्र जी नें हिन्दी लेखन और प्रकाशन को कटघरे में खडा किया जब उनसे यह प्रश्न पूछा गया कि विक्रम सेठ या सलमान रश्दी के मुकाबले हिन्दी के लेखक स्थान क्यों नहीं बना पाते। उनका मानना था को हिन्दी में लेखन एक “पार्ट-टाईम” एक्टिविटी है। उन्होंने साहित्य शिल्पी को इंगलैंड में उनके द्वारा हिन्दी के लिये किये गये प्रयासों के विषय में भी बताया। उन्होने अपने लेखन, उसकी दिशा, तथा अपनी प्रमुख कहानियों पर भी हमसे बात की। जब हमने पूछा कि विदेशों में हिन्दी लिखने वाले अधिकतम लेखक 50 वर्ष से अधिक उम्र के हैं व नव-लेखन नदारद है तो उन्होने नवलेखन की कमी के विदेशों में कारणॉ को उजागर करते हुए जोर दे कर कहा कि नव-लेखन की कमी भारत में भी है और बहुत जल्द इसका अहसास होने लगेगा। यहाँ पी गयी चाय भी यादगार हो गयी। पॉलीथीन में भर कर लायी गयी चाय को लुत्फ ले कर हम सबने पिया। पिकनिक और साहित्य की एसी जुगलबंदी यदा-कदा ही संभव होती है।
तेजेन्द्र जी के साथ हम द्वारका पहुँचे। अपनी आनेवाली पुस्तक के लिये उन्हे कुछ तस्वीरे लेनी थीं। यही हमने अंतर्जाल पर उपलब्ध उनकी कुछ गज़लें भी सुनीं। साहित्य शिल्पी के विभिन्न स्तंभों पर भी उनसे विस्तृत चर्चा हुई। यहाँ से हम झंडेवालान पहुँचे। इरादा था छोले-कुलछे खाने का। कुछ मोडों पर भटकने के बाद हमने एक ढाबे में आलू भरी तंदूरी रोटियाँ और छोले खाये। साथ साथ विभिन्न विषयों पर बातें होती रहीं।
शाम को हिन्द युग्म नाम के एक ब्ळोग नें तेजेन्द्र शर्मा जी का कहानी पाठ आयोजित किया था। तेजेन्द्र जी से हमारे कई साहित्य शिल्पी भी मिलने को उत्सुक थे। हम एकत्रित हुए शाम हिन्दी भवन में। बातें अब भी अधूरी थीं। यहीं तेजेन्द्र जी नें हिन्दी के मूर्धन्य कथाकार और लिविंग लिजेंड असगर वजाहत से साहित्य शिल्पी के सदस्यों को मिलवाया। असगर जी नें अपना चलभाष नं साहित्य शिल्पी को प्रदान किया व हमें मिलने का समय देनें की स्वीकृति भी प्रदान की।

यहीं कैंटीन में बैठ कर तेजेन्द्र जी से बातचीत व उनकी वीडियो रिकॉर्डिंग जारी रही। तेजेन्द्र साहित्य में किसी मुख्यधारा की उपस्थिति से ही इनकार करते हैं। उनका मानना है कि मार्क्सवाद जैसे लेबल लगा कर साहित्य का केवल नुकसान ही किया गया है। तेजेन्द्र जी नें स्वयं को मिले पुरस्कारों व सम्मान के अलावा उनके द्वारा आरंभ किये गये इन्दु शर्मा साहित्य सम्मान के विषय में भी बताया।
कार्यक्रम में तेजिन्द्र जी के कथापाठ से कहानी पढने की कला से भी हमारा परिचय हुआ। कार्यक्रम के बाद चर्चा में उन्होने कहा कि केवल चमत्कार कर देने जैसी भाषा और मोटे मोटे शब्दों का इस्तेमाल कहानी नहीं होता। तेजिन्द्र जी नें उन तत्वों पर विस्तार से चर्चा की जिनसे कहानी बनती है।
रात के आठ बज गये थे। हमारी वापसी आरंभ हुई। हमनें तेजिन्द्र जी से उनकी दिवंगत पत्नि इन्दु शर्मा जी व उनसे जुडे संस्मरणो पर जब बात की तो वे भावुक हो गये। उन्होनें अपना हृदय जैसे उडेल कर रख दिया। उन्होने कहा “तालमहल केवल पत्थरों से ही नहीं बनते”। वे बोले मैं इन्दु का नाम आसमान पर लिख देना चाहता था, इन्दु नें मेरे भीतर के कहानीकार को बनाया और अब मैं टुकडा टुकडा इन्दु उन कहानीकारों में बाँट रहा हूँ जो इस विधा को समर्पित हैं। हमारा मन भी भर आया था। रात के दस बजे जब हम उनसे विदा हुए तो हजारो और प्रश्न उभर आये थे और हम जैसे शून्य पर ही खडे थे। कितना गहरा है यह कहानीकार, कितना समर्पित कितना सादा और कितना महान...।

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[नोट:- साहित्य शिल्पी के पाठको के लिये साक्षात्कार व इंदु जी से जुडे तेजेन्द्र जी के संस्मरण शीघ्र ही प्रस्तुत होंगे। समय समय पर हम तेजेन्द्र जी की आवाज में उनकी कहानियाँ भी प्रस्तुत करेंगे। प्रतीक्षा करें...]
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