एक लम्हे पे रुका है
दिल मेरा ये मनचला है
ना तो मंज़िल ना रास्ता है
फिर कहाँ को बढ़ चला है
क्या जाने कब शब बुझी और
क्या जाने कब दिन ढला है...

ऑस बनकर जो गिरा था
धूप का जो इक सिरा था
दिलनशीं वो गुल सिताँ था
क्या कहें पर सब धुआँ था...
खाब के टूटे रेशे बुनता है ये पगला
औढ के फिर वो पैराहन
बादलों में जा बसा है
आँखों में एक आस सी और
दिल में डर का ज़लज़ला है...

वक़्त को तो गुज़रने दे
जी ले या फिर तू मरने दे
साँसों के गुंजल को खोलो
दिल की सारी बातें बोलो
दिन को भी रात में ही
क्यूँ गिनता है ये पगला
उंघति सी ज़िंदगी में
कोई तो इक वलवला हो
साथ कोई हमसफ़र हो
ना भी हो क्या खला है...