माँ की अपेक्षा

’दुनिया’

मेरे लिए एक छोटा रहस्य है।

दुनिया को जानने का कौतुहूल

जरूर बना रहा मन में

किंतु ‘माँ’ को जानकर

जाना जा सकता है

आसानी से इस ‘संसार’ को

यह बहुत देर में जाना.....

छोटी सी थी तो देखती....

माँ को बडे धैर्य से....

बडी शांति से वह संवार देती थी

’घर और जीवन’ की हर बिगडी चीज को

बिना माथे पर शिकन लाए

गाती गुनगुनाती सहजता से

सब्जी मे भूले से

ज्यादा नमक डल जाने पर

सोख लेती थी उसका ‘सारा खारापन’

सहजता से, आटे की पेडी डाल उसमें....

अधिक डली हल्दी के बदरंग और स्वाद

की ही तरह....

ठीक कर लेती थी

संबधों और परिस्थितियों के भी

बिगडे रंग और स्वाद...

चाय मे अधिक चीनी हो

या फिर फटा दूध

या कि स्वेटर बुनते हुए

असावधानी वश सलाई से छूट गया ‘फन्दा’

(गिरे हुये घर को)

कैसे आसानी से उठा लेती थी ‘माँ’

वह गिरा हुआ फन्दा

कैसे सहेजता से, बुनाई – सिलाई के झोल की

ही तरह

निकाल लेती थी

जीवन के भी सारे झोल.....

हम तो घबरा उठते हैं

छोटी छोटी मुश्किलों में....

छोड देते हैं धैर्ये.....

चुक जाती है शक्ति.....

शायद ‘माँ’ होना

अपने आप मे ही ‘ईश्वरीय शक्ति’

का होना है।