
बात कोई तेरह -चौदह वर्ष पुरानी है। उस रात जब केवल मेरे कमरे में आया तो उसके चेहरे में एक चमक थी। पत्रकारों को किसी नई कहानी के मिलने का एसा ही सुकून होता है जैसा ताजी कविता लिखी जाने के बाद पहले श्रोता को उसे सुना दिये जाने का। चन्द्रू आज उसकी कहानी था। नारायणपुर के जंगलों से थके हारे होने की थकान कहीं नहीं दिखती थी बल्कि वह अपनी उपलब्धि के एक एक पल और वाकये से मुझे अवगत करा देना चाहता था।
केवल अपने यायावर स्वभावानुकूल उन दिनों “दण्डकारण्य समाचार” छोड कर देशबंधु से जुड गया था। देशबंधु अखबार ने ही “हाईवे चैनल” नाम के सान्ध्य अखबार का आरंभ किया था जिसके स्थानीय अंक का कार्यभार देखने के उद्देश्य से केवल उन दिनों जगदलपुर में ही था।
“मुझे आलोक पुतुल नें फोन कर के बताया कि बस्तर में किसी आदिवासी लडके पर फिल्म बनी है और उस पर स्टोरी करनी चाहिये। मुझे मालूम था कि ये असंभव सा काम है। मुझे आगे पीछे की कोई जानकारी नहीं थी। न फिल्म का नाम पता था न किसने बनाई है वो जानकारी थी।” केवल के स्वर में अपनी खोज को पूरी किये जाने का उत्साह साफ देखा जा सकता था।
“अबे ‘बस्तर एक खोज’ तू स्टोरी तक भी पहुँचेगा कि सडक ही नापता रहेगा।” मैंने स्वभाव वश उसे छेड दिया था।
“तू पहले पूरी बात सुन लिया कर।...। मैं अपना ‘क्लू’ ले कर बसंत अवस्थी जी के पास गया उन्होंने मुझे किन्ही इकबाल से मिलने के लिये कहा जो आसना में रहते हैं। उनसे इतना तो पता चला कि नारायणपुर के किसी आदिवासी पर एसी फिल्म बनी है। तुरंत ही मैनें “नारायणपुर विशेष” लिखने के नाम पर अपना टूर बनाया लेकिन दिमाग में यही कहानी चल रही थी। नारायणपुर पहुँच कर बहुत कोशिशों के बाद मुझे चन्द्रू के विषय में जानकारी मिली”
“आखिरकार तेरी सडक कहीं पहुँची तो..” मैने मुस्कुरा कर कहा। हालांकि मैं जिज्ञासु हो गया था कि यह चंद्रू कौन है? कैसा है? उसपर फिल्म क्यों बनी?
“ये अंतराष्ट्रीय फिल्म का हीरो चन्द्रू उस समय घर पर नहीं था जब मैं गढबंगाल में उसके घर पर पहुँचा। वो झाड-फूंक करने पडोस के किसी गाँव गया हुआ था” केवल नें बताया।

“कैसा था चंद्रू का घर” मैंने अनायास ही बचकाना सवाल रख दिया। मेरी उत्कंठा बढ गयी थी।
“जैसा बस्तरिया माडिया का होता है। तुझे क्या मैं शरलॉक होम्स की स्टोरी सुना रहा हूँ? वही मिट्टी का मकान, वही गोबर से लिपी जमीन, वही बाँस की बाडी।...। मुझे वहाँ बहुत देर तक उसका इंतजार करना पडा।“
“मुलाकात हुई?” यह प्रश्न जानने की जल्दबाजी के कारण मैंने किया था।
“मुलाकात!!! उसे अब न फिल्म में अपने काम की याद थी न फिल्म बनाने वालों की। उसके लिये फिल्म एक घट गयी घटना की तरह थी जिसके बाद वह लौट आया और फिर आम बस्तरिया हो गया। उसकी जीवन शैली में कोई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म का हीरो नहीं था यहाँ तक कि उसकी स्मृतियों या हावभाव में भी एसा कुछ किये जाने का दर्प या आभास नहीं था....”

“कितनी अजीब बात है न?”
“अजीब यह भी था कि उसके पास अपने किये गये काम की कोई जानकारी या तस्वीर भी नहीं थी। बहुत ढूंढ कर उसने एक किताब निकाल कर दिखाई और बताया कि इसमें उसकी फिल्म की तस्वीर है। वह इतनी बुरी हालत में थी कि उसे किताब नहीं कह सकते थे। अंग्रेजी की इस पुस्तक को मैने जानकारी मिलने की अपेक्षा में उससे माँग लिया।“
“वो क्यों देगा? उसके पास वही आखिरी निशानी रही होगी अपने काम की?”
“वही तो आश्चर्य है। उसने बडे ही सहजता से पुस्तक मुझे दे दी। मैं उसे लौटा लाने का वादा कर के उसे ले आया हूँ। किताब को अभी सिलने और बाईंड कराने के लिये दे कर आ रहा हूँ।”
केवल नें चंद्रू का एक चित्र सा खींच दिया था। मेरी कल्पना में वह “मोगली” या “टारजन”जैसा ही था। चंद्रू को सचमुच क्या मालूम होता कि उसने क्या काम किया है या कि उसने केवल को जो पुस्तक दी है खुद उसके लिये कितने मायने रखता है। जंगल से अधिक उसके लिये शायद ही कुछ मायने रखता होगा?
केवल से मैं उसकी इस कहानी के विषय में जानने की कोशिश करता रहा। उसने कहानी अलोक पुतुल को देशबंधु कार्यालय भेज दी थी। आलोक नें उस कहानी में श्रम कर तथा उसमें अपने दृष्टिकोण को भी जोड कर संवारा और फिर यह देशबंधु के अवकाश अंक में प्रकाशित भी हुआ। चंद्रू को चर्चा मिली और यह भी तय है कि अपनी इस उपलब्धि और चर्चा से भी वह नावाकिफ अपनी दुनिया में अपनी सल्फी के साथ मस्त रहा होगा। उन ही दिनों इस स्टोरी पर चर्चा के दौरान ही केवल नें मुझे बताया था कि संपादक ललित सुरजन अवकाश अंक पर इस स्टोरी के ट्रीटमेंट से खुश नहीं थे और उनकी अपेक्षा इस अनुपम कहानी के ‘और बेहतर’ प्रस्तुतिकरण की थी। यद्यपि कहानी यहीं समाप्त नहीं हुई। न तो केवल की और न ही चन्द्रू की।

केवल के साथ मैं धरमपुरा में दादू की दुकान पर चाय पी रहा था। केवल की आवाज में आज चन्द्रू की बात करते हुए वह उत्साह नहीं था।
“तूने चन्द्रू को किताब वापस कर दी?” मैने बात आगे बढाई।

“हाँ, मैं किताब और अखबार की रिपोर्ट के साथ नारायणपुर जा रहा था। कांकेर में कमल शुक्ला से मिलने के लिये रुक गया। वही एक और पत्रकार साथी हरीश भाई मिले। स्टोरी को पढने के बाद वो इतने भावुक हो गये कि उसे ले कर कही चले गये...जब लौटे तो उनके हाथ में एक फोटोफ्रेम था जिसमें यह खबर लगी हुई थी।“
“फिर तू चन्द्रू से मिला?”
“मैं जब गढबंगाल पहुँचा तो चन्द्रू घर पर नहीं था। घर के बाहर ही चन्द्रू की माँ मिल गयी जो अहाते को गोबर से लीपने में लगी हुई थी।“
“तूने इंतजार नहीं किया?”
“नहीं मैं देर शाम को ही पहुँचा था और मुझे लौटना भी था। जब मैने अपने आने का कारण चन्द्रू की माँ को बताया और उसे जिल्द चढी किताब के साथ फोटो फ्रेम में मढी खबर दी...”
“खुश हो गयी होगी?”
“नहीं। उसने जो सवाल किया मैं उसी को सोचता हुआ उलझा हुआ हूँ”
“तू भी पहेलियों में बात करता है”
“चन्द्रू की माँ ने कुछ देर फोटो फ्रेम को उलटा-पलटा। अपने बेटे की तसवीर को भी देखने की जैसे कोई जिज्ञासा उसमें दिखी नहीं..फिर उसने मुझसे कहा – ‘तुम लोग तो ये खबर छाप के पैसा कमा लोगे? कुछ हमको भी दोगे?”
“फिर?” मुझे एकाएक झटका सा लगा।
“पहले पहल ये शब्द मुझे अपने कान में जहर की तरह लगे। फिर मुझे इन शब्दों के अर्थ दिखने लगे। मैने शायद पचास या साठ रुपये जो मेरे पास थे उन्हे दे दिये थे और अपने साथ यही सवाल के कर लौट आया हूँ कि ‘हमको क्या मिला?’...” केवल नें गहरी सांस ली थी।
आज बहुत सालों बाद चन्द्रू फिर चर्चा में है। जी-टीवी का चन्द्रू पर बनाया गया फीचर ‘छत्तीसगढ़ के मोगली’ को राज्योत्सव में सम्मानित किया जा रहा है। मैं स्तब्ध हूँ कि चन्द्रू को खोज निकालने वाला केवलकृष्ण, उसे ढूंढ निकालने की सोच वाला आलोक पुतुल...कोई भी तो याद नहीं किया जा रहा। मैं आज फिर चन्द्रू की माँ के उसी प्रश्न को भी देख रहा हूँ जो कि पुरस्कार और उत्सव बीच निरुत्तर भटक रहा है – “हमें क्या मिला?”
चन्द्रू पर बाद में अनेकों डॉक्यूमेंट्री भी बनी प्रस्तुत है एसी ही एक फिल्म का वीडियो (गूगल वीडियो से साभार)....
39 टिप्पणियाँ
राजीव जी बात सही है कि हमें क्या मिला एक बहुत बडा सवाल है।
जवाब देंहटाएंबहुत खूब. केवल कृष्ण और आलोक पुतुल जी को मेरा नमन. मुझे नहीं लगता कि केवल कृष्ण जी या आलोक पुतुल जी ने किसी सम्मान की चाह में ऐसा किया होगा. जिस तरह की रिपोर्टिंग का आपने उल्लेख किया है, उस तरह की रिपोर्ट असाइन करना और रिपोर्ट करने का काम पत्रकारिता को धर्म की तरह निबाहने वाले ही कर सकते हैं. हां, हमारे समाज का यह दायित्व है कि इन पत्रकारों को याद करते. सरकार में बैठे अंधे लोगों को केवल अंधे चाहिये, जिन्हें वे चिन्ह-चिन्ह के रेवड़ी बांटें.
जवाब देंहटाएंइन दोनों पत्रकार बंधुओं को मेरा शत-शत प्रणाम.
युद्धवीर
रायपुर, छत्तीसगढ़
MEHNAT KARE MURGI AUR ANDE KHAE FAKEER :)
जवाब देंहटाएंNICE ARTICLE
-ALOK KATARIA
चन्द्रू को जान कर अच्छा लगा और आश्चर्य भी हुआ। केवल और आलोक दोनो की जीत है वो पुरस्कार जो राज्योत्सव में चाहे किसी को भी दिया जा रहा हो।
जवाब देंहटाएंइस स्टोरी के कई पहलू दिमाग में कौंध जाते हैं -सभी तो नहीं कुछ पर जरूर प्रतिक्रिया करूँगा !
जवाब देंहटाएं!फोटो लाजवाब लगाई गयी हैं ,चंद्रू की ही हैं न ?
चाहे स्लम डाग हो या चंद्रू सबकी नियति एक ही है ...
वह फिल्म कौन सी थी क्या टोरा टोरा?
कुछ लोग केवल अपनी आत्मतुष्टि के लिए मनचाहा काम करते हैं ,उन्हें सांसारिक अलंकरणों के तराजू पर मत तौलिये !
राजीवजी,
जवाब देंहटाएंआपका लिखा संस्मरण एक ही सांस में पढ़ गई। अदभुत। चंद्रू की मासूमियत और हम पढ़े लिखे लोगों की स्वार्थपरकता खुलकर सामने आ गई। चंद्रू की मां का सवाल हमारी नियत पर सवाल खड़ा करता है साथ ही आग़ाह भी कि आदिवासी उतने अनजान नहीं हैं जितना हम समझते हैं। वे हमारी बदनियति से वाकिफ़ हैं।
इस दिल छू लेनेवाले संस्मरण के लिये बधाई।
मधु, मुंबई।
स्तब्ध हूँ कि चन्द्रू को खोज निकालने वाला केवलकृष्ण, उसे ढूंढ निकालने की सोच वाला आलोक पुतुल...कोई भी तो याद नहीं किया जा रहा। मैं आज फिर चन्द्रू की माँ के उसी प्रश्न को भी देख रहा हूँ जो कि पुरस्कार और उत्सव बीच निरुत्तर भटक रहा है – “हमें क्या मिला?
जवाब देंहटाएं--
इसे आज के समाज की विडम्बना ही कहा जाना चाहिए!
असली गुम हो गये हैं और नकली सम्मानित हो रहे हैं!
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आपकी पोस्ट ने सत्य पर से नकाब हटाने का अच्छा काम किया है!
मर्मस्पर्शी संस्मरण है। मैं चन्द्रू की माँ के उस प्रश्न के साथ में हूँ कि हमें क्या मिला। केवल और आलोक तक अगर मेरी टिप्पणी पहुची हो तो वे मेरी शुभकामनायें स्वीकार करें।
जवाब देंहटाएंआजकल का ज़माना ही ऐसा है... कारीगरी किसी और की होती है और नाम कोई और कमा जाता है...
जवाब देंहटाएं'तारे ज़मीन पर' के डायरेक्टर को आमिर खान ने हाशिए पर धकेल खुद ही सारा श्रेय ले लिया था ...उसके बाद 'थ्री इडियटस' की भारी भरकम सफलता के पीछे भी असली दिमाग(लेखन) चेतन भगत का था लेकिन उसका नाम फिल्म के अंत में ऐसे दिया गया कि किसी को पता भी ना चले...
अब 'पीपली लाईव' की डायरेक्टर के साथ आमिर खान ने ऐसा ही किया है...आस्कर अवार्ड्स की अंधी भागदौड़ में आमिर खान ...
उसकी ऐसी आदत का पता होने के बावजूद भी लोग ना जाने क्यों उसी के पीछे मरते हैं?
एसें ही चन्दु भारत की गली गी मै मिल जायेंगे
जवाब देंहटाएंक्या कहा जाए , बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंअवनीश तिवारी
सच्चाई है...
जवाब देंहटाएंबात सोचने की है। बहुत रोचक संस्मरण लिखा गया है
जवाब देंहटाएं। इस तरह की घटनायें आम अहो गयी हैं। ये भी सच है कि चन्द्रू को खाली हाथ ही रहना है।
केवल को मैं नहीं जानता लेकिन वो जो भी हैं उसे अपने काम पर गर्व होना चाहिये।
जवाब देंहटाएंराजीव भाई | शासकीय पुरस्कार व सम्मान मांगने व आवेदन पर ही मिलता है | केवल को मै अच्छी तरह जनता हूँ , ओ हाथ तो फैलाएगा नहीं | केवल ने कई ऐसे काम किये है जिसके लिए बुद्धिजीवियों के मन में सम्मान है | इस स्टोरी के लिए केवल की मेहनत का मै एक गवाह हूँ | उस समय रायपुर के पत्रकार साथियों के साथ इस रपट पर चर्चा करते समय की एक बात याद आ रही है , देशबंधु के ही एक साथी ने बताया था की देशबंधु के प्रधान संपादक श्री ललित सुरजन ने इस रिपोर्टिंग को फीचर पेज पर छापे जाने पर नाराजगी जाहिर किया था , उनका विचार था की यह खबर पहले पन्ने पर लीद स्टोरी के रूप में जाना था | मै उम्मीद करता हूँ की राज्य शासन गलती सुधारते हुए इसी राज्योत्सव में बिना मांगे ही स्वयं चेंद्रू व केवल का सम्मान करेगा|
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परसों आपसे बात हुई और आपने यह संस्मरण तैयार कर छाप भी दिया, वाह.
जवाब देंहटाएंइस खबर के पीछे केवल भाई थे यह तो जानकारी में थी लेकिन परसों आपसे बात होने से पहले सुबह आलोक पुतुल जी से फ़ोन पर लम्बी बात हुई तो उन्होंने सारी जानकारी दी कि कैसे उन्हें कहीं से ये खबर लगी फिर कैसे उन्होंने केवल भाई को इस स्टोरी पर लगाया और उन्होंने किस तरह मेहनत से यह सारी जानकारी निकाली. हाँ पुतुल जी ने भी यह बताया कि छपने के बाद ललित सुरजन जी नाराज हुए थे कि इस पर और बेहतर काम हो सकता था.
अंतिम बात जो स्तब्ध कर रही है आपको, वही आज छत्तीसगढ़ की है. सवाल बस जुगाड़ का है. कैसे चयन समिति- ज्यूरी के एक वरिष्ठ सदस्य ने दबाव बनाया यह अवार्ड " छत्तीसगढ़ के मोगली" को देने के लिए , यह तो मैंने अपने ब्लॉग पर लिखा ही है. जानो मानो छत्तीसगढ़ कि समूची संस्कृति ही मोगली है. जानो मानो मोगली यही पैदा हुआ था अफ्रीका में नहीं . जय जुगाड़
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यह टिप्पणी इसी आलेख पर "छतीसगढ ब्लॉग" में की गयी
चंद्रु पर बनी फ़िल्म तो मैने देखी थी और इसके विषय में समाचार भी पढा था।
जवाब देंहटाएंलेकिन समाचार के पार्श्व में
केवल
है यह पहली बार आपकी पोस्ट से जाना।
जिसने काम किया है उसे श्रेय मिलना ही चाहिए।
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यह टिप्पणी इसी आलेख पर "छतीसगढ ब्लॉग" में की गयी
ऐसी बातों को पढकर अजीब सा लगता है .. इस देश की यही तो त्रासदी है !!
जवाब देंहटाएंbarhiyaa...sundar...yadgaar-lekhan. poora chitra aata hai samane chandroo ka ..
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यह टिप्पणी इसी आलेख पर "छतीसगढ ब्लॉग" में की गयी
चंद्रू के बारे में कई माध्यमों के द्वारा जानकारियाँ देखता रहा हूँ
जवाब देंहटाएंयहाँ उसके बारे में कुछ और जानकारी मिली
आभार
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यह टिप्पणी इसी आलेख पर "छतीसगढ ब्लॉग" में की गयी
राजीव भाई आपका ईमेल आया था कि आप बस्तर के उन इलाकों में 2 सप्ताह थे जहां इंटरनेट या मोबाईल रिसेप्शन जैसी सुविधा के बारे में सोच पाना संभव नहीं था। आप ऐसी संवेदनशील कहानी ले कर लौटे हैं कि पढ़ कर रोंगटे खड़े हो गये। ... चन्द्रू जैसे लोग हमेशा ठगे जाते हैं। यदि चन्द्रू अब बूढ़ा हो चुका है तो ये चित्र किसके हैं। इतने साफ़ सुथरे और सजीव चित्र किसने संभाल कर रखे थे। आपको कुछतो हमें बताना होगा। आप जो उपन्यास लिखने वाले हैं उसकी प्रतीक्षा अभी से शुरू हो गई है।
जवाब देंहटाएंएक लय में बहुत कुछ बयान करता संस्मरण .. बस्तर , पत्रकारिता , आदिवासी जीवन .. सच्ची पत्रकारिता बड़ा जीवट वाला काम है और शक्तिशाली भी है . विडम्बना ही है कि गुमनामियों में दबी धंसे लोगो को सतह पर लाने वाले , उन्हें दुनिया के सामने रखने का माद्दा रखने वाले लोग , खुद ही गुमनाम हुए जा रहे हैं ... पर शायद इस से नाम पाना उन का मकसद रहा भी नहीं हो . :) अपने आप पर बनी फिल्म को ले कर चंद्रू की उदासीनता एक ही समय में मासूम और प्रौड़ दोनों है .....
जवाब देंहटाएंवाकई पुराने दिनों की याद ताजा़ करा दी आपने भाई...मजा़ आ गया...
जवाब देंहटाएंचंद्रू जैसे कई लोग हैं हमारे समाज में जो अपनी अद्भुत उपलब्धियों के बावज़ूद समाज और प्रशासन की घोर उपेक्षा झेल रहे हैं| वहीं कुछ और लोग है जो इनके सहारे प्रतिष्ठित हुये और प्रतिष्ठा की इस चकाचौंध में इन्हें भूल गए|
जवाब देंहटाएंकेवलकृष्ण या आलोक पुतुल जैस कुछे लोग कभी कभी इन्हें समाज के सामने लाने की कोशिश करते हैं पर विडम्बना है कि ऐसे लोग खुद भी प्राय: उपेक्षित ही रह जाते हैं|
जहां तक मेरी जानकारी है, नाम 'चेंदरू'(अथवा चेन्दरू) है, न कि विदेशी उच्चारण 'चंद्रू' जैसाकि लिखा जाता है. फिल्म का नाम, जो नहीं लिखा जाता अथवा अधिकतर गलत छपता है. वस्तुतः सन 1957 में बनी अर्न सक्सडॉर्फ की उस मूल स्वीडिश फिल्म का नाम 'एन डीजंगलसागा' ('ए जंगल सागा' या 'ए जंगल टेल' अथवा अंगरेजी शीर्षक 'दि फ्लूट एंड दि एरो') था. मैं लगभग 40 साल पहले नारायणपुर के पास एक सप्ताह सोनपुर में रहा था और उसी दौरान पहले-पहल इससे परिचित हुआ था.
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यह टिप्पणी इसी आलेख पर ब्ळोग "सफर" में की गयी।
सन ६० के प्रारंभ में हम भी उस चेंदरू से मिल चुके हैं. बस्तर है स्कूल के सामने के मैदान में गणतंत्र दिवस पर एक प्रदर्शनी लगा करती थी जहाँ आदिवासियों की प्रतिस्पर्धाएं हुआ करती थी. वाही एक स्टाल में एक प्रदर्शन सामग्री के रूप में चेंदरू उपस्थित था. हमने बात भी की थी. sweden का हाल चाल पूछा था.
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यह टिप्पणी इसी आलेख पर ब्ळोग "सफर" में की गयी।
संस्मरण पढ कर और आपके या चन्दू की माँ के सवाल पर निष्ब्द हूँ। कम से कम इनको दो वक्त की रोटी तो मिलती। पहचान से इन्हें शायद उतना मतलव भी न हो और केवल जैसे किन्ग मेकर को सलाम। आभार।
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बहुत ही मर्म्स्पर्शीय .... ये रीत है ज़माने क़ि ... ऊंचेर ऊंचे भवन बनाने वाले मजदूर को कौन पूछता है .... चंदू क़ि माँ का प्रश्न उद्वेलित करता है ... मौन कर देता है ... केवल कृष्ण और आलोक पुतुल जी को मेरा नमन.....
जवाब देंहटाएंprishrm se kiya gya feature hai bahut2 bddhai
जवाब देंहटाएंhme kya mila "aadivasi smaj kabaht bda prshn apne aap me kevl chndrooki kahani hinhi nhi hai apitu pooe aadivashi bndhuon ki krun kth kh rhi hai aaivasi smaj ki oot se jin ke ghr bhr gye ve mje kr rhe hain pr vn bndhu aaj bhi usi hatme hain koi bhi un kee sudh lene vala nhi ai jo sudh eneka natk kr rhe an un ka sb kuchh rnkr rhe hai un ki snskriti un ka dhrm krm v desh ptrem tk bhi unki manytayen bhi smapt r rhe hain sath hi desh ke prti droh ki bhavna bhi bhr rhe hain
bhai rajiv ne vn bnhuonkee vytha k o bhut dhridh aavaj dee hai
meri prarthna hai is mshalko nirntr jlayen rkhen v is aavaj ko door tk gunjane a prytn kren
चन्द्रू को और जानना चाहूँगी। केवल जी हम पाठको% के लिये एक बार फिर चन्द्रू से मिलिये।
जवाब देंहटाएंआदरणीय राजीव जी,
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर आलेख है पढने की उत्सुकता अंत तक बढती ही गयी .अपने देश की यही विडंबना है कि लोग अपने स्वार्थ के लिए साधारण लोगों को stepping stone मान कर प्रयोग करते हुए आगे बढ़ते हैं.मानवीयता तो जैसे लुप्त सी हो गयी है .आपने अपने विचार परक आलेख द्वारा समाज का ध्यान इस ओर आकर्षित कर एक अच्छा कार्य किया है आपको अनेकानेक बधाईयाँ ,
सादर
श्रीप्रकाश शुक्ल
नमस्कार राजीव जी
जवाब देंहटाएंआपके लेख काफी प्रभावषाली रहें हैं मैं व्यक्तिगत रूप से आपके इस प्रयासो और आपकी इन कोषिषों के लिए आपको और आपकी टीम को बधाई देता हैं ।
अजीत कुमार जैन
priy bhai,
जवाब देंहटाएंaapka likha aaj padh paaya .ye sab kuch mere saamne ka hi hai . kewal ki mehnat , alok putul ka yogdaan ...sab kuch aapne bilkul sahi likha hai . kisi naye paathak ke liye yah sansmaran rochak hi nahin ek patrkaar ke saath nyaay bhi hai . is fakkad patrkaar kewal ne kisi sarkaari puraskaar ke liye kabhi kaam nahi kiya . apni patrkaarik mehnat se mila santosh hi iske liye sabkuch raha .lekin chendru ko gumnaami se nikaalne ka shrey kewal krishn ko hai aur aisa karke usne apni patrkaarik zimmedaari hi nibhayi hai . kisi bhi puraskaar ki ye haisiyat nahin ho sakti ki woh is zimmedari ko taul bhi nahin sake !kewal ne jo kiya woh dastavej hai .jise apne ko sudharana ho aur apne ko vishvasneey bhi banana ho woh ise dekh sakta hai .
aur chendru ki maa aaj bhi apne sawal ka jawab talaash rahi hogi...doosri taraf use jawab itni bandooken aur goliyan de rahin hain ki shayad sawal hi uthne bnd ho
jaayen !
saadar
ruchir garg .
प्रिय राजीव रंजन जी
जवाब देंहटाएंनमस्कार
छत्तीसगढ़ के मोगली चंद्रू के बारे में आपका लेख पढ़ा. आपने सही लिखा है. सबसे पहले मैं आपको बता दूँ कि केवलकृष्ण भैया आजकल रायपुर से प्रकाशित दैनिक नेशनल लुक समाचार पत्र में हम लोगों के साथ डेस्ट इंचार्ज के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. केवल भैया ने एक बार चर्चा के दौरान मुझे चंद्रू के बारे में बताया था. शायद उस समय ज्यादा ध्यान नहीं दिया, लेकिन आपका लेख पढ़ने के बाद इसके महत्व को समझ पाया और केवल भैया को कहे गए चंद्रू की माँ के शब्द " हमें क्या मिला " घंटों दिमाग में गूंजता रहा. ४० साल पहले इतना बड़ा काम करने वाले चंद्रू आज किस अवस्था में है इसका हम छत्तीसगढ़वासियों को भी पता नहीं और न ही उनके काम के महत्व को हम लोग समझ पाए हैं. राज्य बनने के बाद विकास के घोड़े की रफ़्तार शायद राजधानी व शहरी इलाके तक ही सीमित हो गयी है. इसे भरपूर संसाधनों से युक्त धन के कटोरा छत्तीसगढ़ की विडंबना ही कह लीजिये.
लेख के लिए साधुवाद
THANKU FOR YOUR NEW WOOLD .
जवाब देंहटाएंWORLD
जवाब देंहटाएंbahut khub chhattishgarh ki asmita,pahchan our ek sangarsh ki dasta ko logo ke samne lane ke lie.........................
जवाब देंहटाएंbahut badhia............
जवाब देंहटाएंमेरा बचपन कुछ समय जगदलपुर में बीता .. और बचपन की वो स्मृतिया मेरी आँखों से आज भी गुजरती हैं... मैने अपने पुराने स्कूल ..नेशनल इंग्लिश स्कूल जो की राजा के दरबार में हुवा करता था ..को खोजा ..हालाँकि मुझे उसकी कुछ जानकारी नहीं मिली ..किन्तु दो बार मै आपकी कहानी से गुजर गयी पहली बार टिपण्णी नहीं कर पायी थी... आज फिर पढ़ी है .. बहुत सी संवेदनाये इस कहानी को खास बनातीं हैं ...और चंद्रू का चित्रण, व केवल ... और आखिरी में वो सवाल हर जो कि तीनो पात्रो के लिए एक ही है कि हमें क्या मिला ... पाठकों को भी सोचने के लिए मजबूर करता है... उम्दा लेख ..
जवाब देंहटाएंआपका स्नेह और प्रस्तुतियों पर आपकी समालोचनात्मक टिप्पणियाँ हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा प्रदान करती हैं.