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छुटपन में
एक स्लेट होती थी
जिसपर उलटे सीधे, टेढ़े मेढ़े
अक्षर उगाते थे हम
जब पहली बार
लिखते थे हम स्लेट पर
तितली की शक्ल का 'क'
सब खुश हो जाते थे

रचनाकार परिचय:-


आलोक शंकर का जन्म रामपुरवा बिहार में २५ अक्तूबर १९८३ को हुआ।

आपने विकास विद्यालय रांची में बारहवी तक पढाई करने के पश्चात कोचीन यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी से सूचना प्राद्यौगिकी में अभियांत्रिकी का अध्य्यन किया है|

वर्त्तमान में आप बेंगलुरु में सिस्को सिस्टम्स में सॉफ्टवेर इंजिनियर के रूप में कार्यरत हैं|

आप विभिन्न कवि सम्मेलनों , मुशायरों में काव्य पाठ करने के अलावा रेडियो और विभिन्न वेब साईट पर कवितायें प्रसारित - प्रकाशित करते रहे हैं।

वे अक्षर बड़े आजाद थे,
कभी तितली
कभी गौरैया
कभी चींटी
हुआ करते थे
छोटी छोटी उंगलियाँ
जैसा जी चाहा, वैसा ही 'क'
लिख लेतीं थीं ।

फ़िर धीरे धीरे हाथ पकड़ कर
सीखा हमने
गौरैया, चीँटी और तितली को
'क' लिखना।
उड़ते-भागते अक्षर स्लेट पर
ऐसे चिपके
कि फ़िर न हिल सके।

फ़िर स्लेट बदल गयी, और
कापियों में अक्षर बिछाने लगे हम
पहले सादी और फ़िर
रूल वाली कापियों में,
ताकि दो रेखाओं के
जमीन और आसमान की कैद से
छूट न पायें ये शैतान अक्षर!

फ़िर शायद
धीरे धीरे
अक्षरों की भी उड़ने और भागने की इच्छा
खत्म हो गयी,
वे भी खुश हो लेते थे
अपने सुडौल और सही
रेखाओं के बीच फ़ँसे होने पर।

फ़िर जब भी
रूल वाली उस कापी में
कोई अक्षर इधर उधर भटकता
तो उसे लाल रंग से काट दिया जाता
शायद अक्षरों का रक्त भी लाल ही था।
फ़िर वे अक्षर घबराने लगे
कि कहीं उन्हें भी
इधर उधर भटकने पर
काट न दिया जाय।

इसके बाद
सुडौल आकार में
किताबों और कापियों में
सही जगह पर
छापे गये वे -

सबने उन्हें अपने-अपने तरीके से
अलग अलग क्रम में
सजाया, लिखा
फ़िर छापा
जिसने जितने अच्छे क्रम में
सजाया उन्हें,
बाजार में वे उतना ही बिके।
लेकिन
फ़िर कभी वे अक्षर
तितली या गौरैया न हो सके|